Kanda stringclasses 7
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|---|---|---|---|---|
Uttara Kanda | 99 | 4 | अपश्यमानो वैदेहीं मेने शून्यमिदं जगत् । शोकेन परमायस्तो न शान्तिं मनसा ऽगमत् ।। 7.99.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 5 | विसृज्य पार्थिवान्सर्वानृक्षवानरराक्षसान् । जनौघं विप्रमुख्यानां वित्तपूर्वं विसृज्य च ।। 7.99.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 6 | एवं समाप्य यज्ञं तु विधिवत्स तु राघवः । ततो विसृज्य तान्सर्वान्रामो राजीवलोचनः ।। 7.99.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 7 | हृदि कृत्वा तदा सीतामयोध्यां प्रविवेश ह । इष्टयज्ञो नरपतिः पुत्रद्वयसमन्वितः ।। 7.99.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 8 | न सीतायाः परां भार्यां वव्रे स रघुनन्दनः । यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ।। 7.99.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 9 | दशवर्षसहस्राणि वाजिमेघानथाकरोत् । वाजपेयान्दशगुणांस्तथा बहुसुवर्णकान् ।। 7.99.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 10 | अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां गोसवैश्च महाधनैः । ईजे क्रतुभिरन्यैश्च स श्रीमानाप्तदक्षिणैः ।। 7.99.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 11 | एवं स कालः सुमहान्राज्यस्थस्य महात्मनः । धर्मे प्रयतमानस्य व्यतीयाद्राघवस्य तु ।। 7.99.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 12 | अनुरञ्जन्ति राजानमहन्यहनि राघवम् । ऋक्षवानररक्षांसि स्थिता रामस्य शासने ।। 7.99.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 13 | काले वर्षति पर्जन्यः सुभिक्षं विमला दिशः । हृष्टपुष्टजनाकीर्णं पुरं जनपदास्तथा ।। 7.99.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 14 | नाकाले म्रियते कश्चिन्न व्याधिः प्राणिनां तथा । नानर्थो विद्यते कश्चिद्रामे राज्यं प्रशासति ।। 7.99.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 15 | अथ दीर्घस्य कालस्य राममाता यशस्विनी । पुत्रपौत्रैः परिवृता कालधर्ममुपागमत् ।। 7.99.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 16 | अन्वियाय सुमित्रा च कैकेयी च यशस्विनी । धर्मं कृत्वा बहुविधं त्रिदिवे पर्यवस्थिता ।। 7.99.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 17 | सर्वाः प्रमुदिताः स्वर्गे राज्ञा दशरथेन च । समागता महाभागाः सर्वधर्मं च लेभिरे ।। 7.99.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 18 | तासां रामो महादानं काले काले प्रयच्छति । मातऽणामविशेषेण ब्राह्मणेषु तपस्विषु ।। 7.99.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 19 | पित्र्याणि ब्रह्मरत्नानि यज्ञान्परमदुस्तरान् । चकार रामो धर्मात्मा पितऽन्देवान्विवर्धयन् ।। 7.99.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 20 | एवं वर्षसहस्राणि बहून्यथ ययुः सुखम् । यज्ञैर्बहुविधं धर्मं वर्धयानस्य सर्वदा ।। 7.99.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 21 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे एकोनशततमः सर्गः ।। 99 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 1 | कस्यचित्त्वथ कालस्य युधाजित्केकयो नृपः । स्वगुरुं प्रेषयामास राघवाय महात्मने । गार्ग्यमङ्गिरसः पुत्रं ब्रह्मर्षिममितप्रभम् ।। 7.100.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 2 | दश चाश्वसहस्राणि प्रीतिदानमनुत्तमम् ।। 7.100.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 3 | कम्बलानि च रत्नानि चित्रवस्त्रमथोत्तमम् । रामाय प्रददौ राजा शुभान्याभरणानि च ।। 7.100.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 4 | श्रुत्वा तु राघवो धीमान्महर्षिं गार्ग्यमागतम् । मातुलस्याश्वपतिनः प्रहितं तन्महाधनम् ।। 7.100.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 5 | प्रत्युद्गम्य च काकुत्स्थः क्रोशमात्रं सहानुजः । गार्ग्यं सम्पूजयामास यथा शक्रो बृहस्पतिम् ।। 7.100.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 6 | तथा सम्पूज्य तमृषिं तद्धनं प्रतिगृह्य च । पृष्ट्वा प्रतिपदं सर्वं कुशलं मातुलस्य च । उपविष्टं महाभागं रामः प्रष्टुं प्रचक्रमे ।। 7.100.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 7 | किमाह मातुलो वाक्यं यदर्थं भगवानिह । प्राप्तो वाक्यविदां श्रेष्ठः साक्षादिव बृहस्पतिः ।। 7.100.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 8 | रामस्य भाषितं श्रुत्वा महर्षिः कार्यविस्तरम् । वक्तुमद्भुतसङ्काशं राघवायोपचक्रमे ।। 7.100.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 9 | मातुलस्ते महाबाहो वाक्यमाह नरर्षभः । युधाजित्प्रीतिसंयुक्तं श्रूयतां यदि रोचते ।। 7.100.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 10 | अयं गन्धर्वविषयः फलमूलोपशोभितः । सिन्धोरुभयतः पार्श्वे देशः परमशोभनः ।। 7.100.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 11 | तं च रक्षन्ति गन्धर्वाः सायुधा युद्धकोविदाः । शैलूषस्य सुता वीर त्रिकोट्यो वै महाबलाः ।। 7.100.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 12 | तान्विनिर्जित्य काकुत्स्थ गन्धर्वनगरं शुभम् । निवेशय महाबोहो स्वे पुरे सुसमाहिते ।। 7.100.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 13 | अन्यस्य न गतिस्तत्र देशः परमशोभनः । रोचतां ते महाबाहो नाहं त्वामहितं वदे ।। 7.100.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 14 | तच्छ्रुत्वा राघवः प्रीतो महर्षेर्मातुलस्य च । उवाच बाढमित्येव भरतं चान्ववैक्षत ।। 7.100.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 15 | सो ऽब्रवीद्राघवः प्रीतः साञ्जलिप्रग्रहो द्विजम् । इमौ कुमारौ तं देशं ब्रह्मर्षे विचरिष्यतः ।। 7.100.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 16 | भरतस्यात्मजौ वीरौ तक्षः पुष्कल एव च । मातुलेन सुगुप्तौ तु धर्मेण सुसमाहितौ ।। 7.100.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 17 | भरतं चाग्रतः कृत्वा कुमारौ सबलानुगौ । निहत्य गन्धर्वसुतान्द्वे पुरे विभजिष्यतः ।। 7.100.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 18 | निवेश्य ते पुरवरे आत्मजौ सन्निवेश्य च । आगमिष्यति मे भूयः सकाशमतिधार्मिकः ।। 7.100.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 19 | ब्रह्मर्षिमेवमुक्त्वा तु भरतं सबलानुगम् । आज्ञापयामास तदा कुमारौ चाभ्यषेचयत् ।। 7.100.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 20 | नक्षत्रेण च सौम्येन पुरस्कृत्याङ्गिरस्सुतम् । भरतः सह सैन्येन कुमाराभ्यां विनिर्ययौ ।। 7.100.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 21 | सा सेना शक्रयुक्तेव नगरान्निर्ययावथ । राघवानुगता दूरं दुराधर्षा सुरैरपि ।। 7.100.21 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 22 | मांसादानि च सत्त्वानि रक्षांसि सुमहान्ति च । अनुजग्मुर्हि भरतं रुधिरस्य पिपासया ।। 7.100.22 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 23 | भूतग्रामाश्च बहवो मांसभक्षाः सुदारुणाः । गन्धर्वपुत्रमांसानि भोक्तुकामाः सहस्रशः ।। 7.100.23 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 24 | सिंहव्याघ्रवराहाणां खेचराणां च पक्षिणाम् । बहूनि वै सहस्राणि सेनाया ययुरग्रतः ।। 7.100.24 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 25 | अध्यर्धमासमुषिता पथि सेना निरामया । हृष्टपुष्टजनाकीर्णा केकयं समुपागमत् ।। 7.100.25 ।। | null |
Uttara Kanda | 100 | 26 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे शततमः सर्गः ।। 100 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 1 | श्रुत्वा सेनापतिं प्राप्तं भरतं केकयाधिपः । युधाजिद्गार्ग्यसहितं परां प्रीतिमुपागमत् ।। 7.101.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 2 | स निर्ययौ जनौघेन महता केकयाधिपः । त्वरमाणो ऽभिचक्राम गन्धर्वान्कामरूपिणः ।। 7.101.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 3 | भरतश्च युधाजिच्च समेतौ लघुविक्रमैः । गन्धर्वनगरं प्राप्तौ सबलौ सपदानुगौ ।। 7.101.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 4 | श्रुत्वा तु भरतं प्राप्तं गन्धर्वास्ते समागताः । योद्धुकामा महावीर्या व्यनदन् वै समन्ततः ।। 7.101.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 5 | ततः समभवद्युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् । सप्तरात्रं महाभीमं न चान्यतरयोर्जयः ।। 7.101.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 6 | खड्गशक्तिधनुर्ग्राहा नद्यः शोणितसंस्रवाः । नृकलेवरवाहिन्यः प्रवृत्ताः सर्वतोदिशम् ।। 7.101.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 7 | ततो रामानुजः क्रुद्धः कालस्यास्त्रं सुदारुणम् । संवर्तं नाम भरतो गन्धर्वेष्वभ्यचोदयत् ।। 7.101.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 8 | ते बद्धाः कालपाशेन संवर्तेन विदारिताः । क्षणेनाभिहतास्तेन तिस्रः कोट्यो महात्मनाम् ।। 7.101.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 9 | तं घातं घोरसङ्काशं न स्मरन्ति दिवौकसः । निमेषान्तरमात्रेण तादृशानां महात्मनाम् ।। 7.101.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 10 | हतेषु तेषु सर्वेषु भरतः केकयीसुतः । निवेशयामास तदा समृद्धे द्वे पुरोत्तमे ।। 7.101.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 11 | तक्षं तक्षशिलायां तु पुष्कलं पुष्कलावते । गन्धर्वदेशे रुचिरे गान्धारविषये च सः ।। 7.101.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 12 | धनरत्नौघसङ्कीर्णे काननैरुपशोभिते । अन्योन्यसङ्घर्षकृते स्पर्धया गुणविस्तरैः ।। 7.101.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 13 | उभे सुरुचिरप्रख्ये व्यवहारैरकिल्बिषैः । उद्यानयानसम्पूर्णे सुविभक्तान्तरापणे ।। 7.101.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 14 | उभे पुरवरे रम्ये विस्तरैरुपशोभिते । गृहमुख्यैः सुरुचिरैर्विमानसमवर्णिभिः ।। 7.101.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 15 | शोभिते शोभनीयैश्च देवायतनविस्तरैः । तालैस्तमालैस्तिलकैर्वकुलैरुपशोभिते ।। 7.101.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 16 | निवेश्य पञ्चभिर्वर्षैर्भरतो राघवानुजः । पुनरायान्महाबाहुरयोध्यां केकयीसुतः ।। 7.101.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 17 | सो ऽभिवाद्य महात्मानं साक्षाद्धर्ममिवापरम् । राघवं भरतः श्रीमान्ब्रह्माणमिव वासवः ।। 7.101.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 18 | शशंस च यथावृत्तं गन्धर्ववधमुत्तमम् । निवेशनं च देशस्य श्रुत्वा प्रीतो ऽस्य राघवः ।। 7.101.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 101 | 19 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे एकोत्तरशततमः सर्गः ।। 101 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 1 | तच्छ्रुत्वा हर्षमापेदे राघवो भ्रातृभिः सह । वाक्यं चाद्भुतसङ्काशं तदा प्रोवाच लक्ष्मणम् ।। 7.102.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 2 | इमौ कुमारौ सौमित्रे तव धर्मविशारदौ । अङ्गदश्चन्द्रकेतुश्च राज्यार्थे दृढविक्रमौ ।। 7.102.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 3 | इमौ राज्ये ऽभिषेक्ष्यामि देशः साधु विधीयताम् । रमणीयो ह्यसम्बाधो रमेतां यत्र धन्विनौ ।। 7.102.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 4 | न राज्ञो यत्र पीडा स्यान्नाश्रमाणां विनाशनम् । स देशो दृश्यतां सौम्य नापराध्यामहे यथा ।। 7.102.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 5 | तथोक्तवति रामे तु भरतः प्रत्युवाच ह । अयं कारुपथो देशो रमणीयो निरामयः ।। 7.102.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 6 | निवेश्यतां तत्र पुरमङ्गदस्य महात्मनः । चन्द्रकेतोः सुरुचिरं चन्द्रकान्तं निरामयम् ।। 7.102.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 7 | तद्वाक्यं भरतेनोक्तं प्रतिजग्राह राघवः । तं च कृत्वा वशे देशमङ्गदस्य न्यवेशयत् ।। 7.102.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 8 | अङ्गदीया पुरी रम्याप्यङ्गदस्य निवेशिता । रमणीया सुगुप्ता च रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।। 7.102.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 9 | चन्द्रकेतोश्च मल्लस्य मल्लभूम्यां निवेशिता । चन्द्रकान्तेति विख्याता दिव्या स्वर्गपुरी यथा ।। 7.102.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 10 | ततो रामः परां प्रीतिं लक्ष्मणो भरतस्तथा । ययुर्युद्धे दुराधर्षा अभिषेकं च चक्रिरे ।। 7.102.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 11 | अभिषिच्य कुमारौ स प्रस्थापयति राघवः । अङ्गदं पश्चिमां भूमिं चन्द्रकेतुमुदङ्मुखम् ।। 7.102.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 12 | अङ्गदं चापि सौमित्रिर्लक्ष्मणो ऽनुजगाम ह । चन्द्रकेतोस्तु भरतः पार्ष्णिग्राहो बभूव ह ।। 7.102.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 13 | लक्ष्मणस्त्वङ्गदीयायां संवत्सरमथोषितः । पुत्रे स्थिते दुराधर्षे अयोध्यां पुनरागमत् ।। 7.102.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 14 | भरतो ऽपि तथैवोष्य संवत्सरमतो ऽधिकम् । अयोध्यां पुनरागम्य रामपादावुपास्त सः ।। 7.102.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 15 | उभौ सौमित्रिभरतौ रामपादावनुव्रतौ । कालं गतमपि स्नेहान्न जज्ञाते ऽतिधार्मिकौ ।। 7.102.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 16 | एवं वर्षसहस्राणि दश तेषां ययुस्तदा । धर्मे प्रयतमानानां पौरकार्येषु नित्यदा ।। 7.102.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 17 | विहृत्य कालं परिपूर्णमानसाः श्रिया वृता धर्मपुरे सुसंस्थिताः । त्रयः समिद्धा इव दीप्ततेजसो महाध्वरे साधु हुतास्त्रयो ऽग्नयः ।। 7.102.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 102 | 18 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे व्द्युत्तरशततमः सर्गः ।। 102 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 1 | कस्यचित्त्वथ कालस्य रामे धर्मपरे स्थिते । कालस्तापसरूपेण राजद्वारमुपागमत् ।। 7.103.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 2 | सो ऽब्रवील्लक्ष्मणं वाक्यं धृतिमन्तं यशश्विनम् । मां निवेदय रामाय सम्प्राप्तं कार्यगौरवात् ।। 7.103.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 3 | दूतो ऽस्म्यतिबलस्याहं महर्षेरमितौजसः । रामं दिदृक्षुरायातः कार्येण हि महाबल ।। 7.103.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 4 | तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सौमित्रिस्त्वरया ऽन्वितः । न्यवेदयत रामाय तापसं तं समागतम् ।। 7.103.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 5 | जयस्व राम धर्मेण उभौ लोकौ महाद्युते । दूतस्त्वां द्रष्टुमायातस्तपसा भास्करप्रभः ।। 7.103.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 6 | तद्वाक्यं लक्ष्मणेनोक्तं श्रुत्वा राम उवाच ह । प्रवेश्यतां मुनिस्तात महौजास्तस्य वाक्यधृत् ।। 7.103.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 7 | सौमित्रिस्तु तथेत्युक्त्वा प्रावेशयत तं मुनिम् । ज्वलन्तमेव तेजोभिः प्रदहन्तमिवांशुभिः ।। 7.103.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 8 | सो ऽभिगम्य रघुश्रेष्ठं दीप्यपानं स्वतेजसा । ऋषिर्मधुरया वाचा वर्धस्वेत्याह राघवम् ।। 7.103.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 9 | तस्मै रामो महातेजाः पूजामर्घ्यपुरोगमाम् । ददौ कुशलमव्यग्रं प्रष्टुमेवोपचक्रमे ।। 7.103.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 10 | पृष्टश्च कुशलं तेन रामेण वदतां वरः । आसने काञ्चने दिव्ये निषसाद महायशाः ।। 7.103.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 11 | तमुवाच ततो रामः स्वागतं ते महामुने । प्रापयास्य च वाक्यानि यतो दूतस्त्वमागतः ।। 7.103.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 12 | चोदितो राजसिंहेन मुनिर्वाक्यमभाषत । द्वन्द्वमेतत्प्रवक्तव्यं हितं वै यद्यपेक्षसे ।। 7.103.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 13 | यः शृणोति निरीक्षेद्वा स वध्यो भविता तव । भवेद्वै मुनिमुख्यस्य वचनं यद्यपेक्षसे ।। 7.103.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 14 | स तथेति प्रतिज्ञाय रामो लक्ष्मणमब्रवीत् । द्वारि तिष्ठ महाबाहो प्रतिहारं विसर्जय ।। 7.103.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 15 | स मे वध्यः खलु भवेत् कथाद्वन्द्वं समीरितम् । ऋषेर्मम च सौमित्रे पश्येद्वा शृणुयाच्च यः ।। 7.103.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 16 | ततो निक्षिप्य काकुत्स्थो लक्ष्मणं द्वारि सङ्ग्रहम् । तमुवाच मुने वाक्यं कथयस्वेति राघवः ।। 7.103.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 17 | यत्ते मनीषितं वाक्यं येन वा ऽसि समाहितः । कथयस्वाविशङ्कस्त्वं ममापि हृदि वर्तते ।। 7.103.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 103 | 18 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे त्र्युत्तरशततमः सर्गः ।। 103 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 1 | शृणु राजन्महासत्व यदर्थमहमागतः । पितामहेन देवेन प्रेषितो ऽस्मि महाबल ।। 7.104.1 ।। | null |
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